प्रिय अर्पिता,

तुम्हारा दुख व्यक्त करना बिल्कुल ठीक है, यह सम्वेदनाएँ व्यक्त करने का समय है, मानव मूल्य दूसरे के दुःख को महसूस करने में है, एक लम्बी साँस में मैं तुम्हारे दिल पे रखा पत्त्थर समझ सकती हूँ।

यही वो समय है जिस दिन के लिए बरसों के जोड़े कंधे साथ आते हैं। तुम सही जगह व्यक्त कर रही हो। हम सभी में तुम्हारी भावनाओं को समझने की शक्ति है।

आज बुद्ध पूर्णिमा है। ध्यान करना । ईश्वर से एकमेक होने का प्रयत्न करना।यह आदमी को मिली ताकतों में से एक है कि ढूढने से राम मिलते हैं, वे हमारे भीतर ही होते हैं और ये की तुम बहुत ताकतवर हो , तुम्हारे अंदर ढेर सारा प्यार है, बालपन से भरा कोमल कौतूहल युक्त मन है। तुम्हारे अंदर जीवन का रस है, आर्द्रता है इसलिए तुम सब कुछ महसूस कर सकती हो।

मौन रहना हो तो मौन रहो पर मुस्कराती रहो ।

इस बात चीत को एक खुले पत्र में सुरक्षित कर रही हूँ।

जाता हुआ समय एक नदी की धारा है

एक ही जल वापस आता नहीं दोबारा है

पर जितनी भी धाराएं आगे आगे जाती हैं

वे दुनिया को निहित सन्देश देती जाती हैं

इतना कुछ देखा ऐसी बाधाएं सही हमने

फिर हुए हैं परिवर्तित पोषित करती नदियों में।

बुद्धम, शरणम, गच्छामि 🙏

प्रज्ञा